कुण्डली की वैज्ञानिक व्याख्या

कुण्डली कागज पर आसमान का जन्म समय का नक्शा है । जो स्थिति इस नक्शे में ग्रहों की होती है वही स्थिति उस समय उत्पन्न होने वाले व्यक्ति के जीवन की होती है, क्योंकि जो भी कोई उत्पन्न होता है उसके लिए उसके जन्म-समय की प्रकृति के गुण-दोषों से अलग रहना असम्भव होता है – यद् ब्रह्माण्डे तत्पिण्डे ।

हमारे पूर्वजा को अनुसन्धान इत्यादि द्वारा ग्रहों के स्वरूप का ज्ञान था। संसार की कोई भी वस्तु हो, चाहे वह शरीर से सम्बन्ध रखती हो चाहे प्रकृति के पदार्थों से, मन से, आत्मा से, बुद्धि से राज्य से; उसका प्रतिनिधि कोई न कोई ग्रह है । जैसे

  • पिता, आँख, हड्डी, आत्मा, राज्य, दिल आदि का विचार सूर्य की दशा देख कर किया जाता है ।
  • माता, आंख, रक्त, मन, कामनाएँ, फेफड़े आदि का विचार चन्द्र की स्थिति आदि से किया जाता है।
  • छोटे भाई, साहस, रक्षा-विभाग, चोरी, जुल्म, पाप, चोट, माँस इत्यादि का मंगल से;
  • त्वचा, साँस की नली, बुद्धि, अन्तड़ियाँ, लिखना-पढ़ना, विद्या आदि का बुध से;
  • ज्ञान, पेट, पाँव, राज्य, कृपा, धन, बेटे, बड़ा भाई, पति आदि का गुरु से;
  • स्त्री, व्यभिचार, आँख, मुख मूतेन्द्रिय, वीर्य, विकास आदि का शुक्र से;
  • काम, टाँगें, ज्ञान-तन्तुएँ (Nerves), रोग, नौकरी आदि का शनि से किया जाता है ।
  • राहु शनि की भाँति और केतु मंगल की भाँति है, क्योंकि राहु-केतु छाया-ग्रह हैं। ये अपनी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखते ।

स्वामित्व का अभिप्राय

जब हम कहते हैं कि एक नम्बर राशि अर्थात् मेष का स्वामी मंगल है तो इसका तात्पर्य केवल इतना ही होता है कि मेष राशि में उपरोक्त मंगल के गुण विद्यमान हैं। इसी प्रकार “शुक्र वृषभ का स्वामी है” इस वाक्य से तात्पर्य यह है कि वृषभ राशि के गुण-दोष शुक्र जैसे हैं ।

जिस प्रकार राशियों के स्वामी हैं इसी प्रकार नक्षत्रों के भी स्वामी ग्रह हैं । अर्थात् प्रत्येक नक्षत्र में भी किसी-न-किसी ग्रह का प्रभाव निहित है। जिस प्रकार राशि, ग्रहपथ का बारहवाँ भाग अर्थात् 360/12 = 30° है इसी प्रकार नक्षत्र भी एक दूरी Distance) है। एक नक्षत्र ग्रहपथ का सताइसवाँ भाग अर्थात् 360/27 = 1320′ है ।

ग्रहों की दृष्टि अर्थात् प्रभाव

प्रत्येक ग्रह जहाँ वह स्थित हो वहाँ से सप्तम स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता है, अर्थात् उस स्थान पर अपना पूर्ण प्रभाव डालता है। यह नियम सब ग्रहों के लिये है ।

इस दृष्टि-प्रभाव के अतिरिक्त विशेष ग्रहों की विशेष दृष्टि (प्रभाव) भी है । अर्थात् मंगल की दृष्टि (अथवा प्रभाव) चौथे तथा आठवें स्थान पर भी पूर्ण पड़ती है। गुरु की दृष्टि (अथवा प्रभाव) पांचवें तथा नवम स्थान पर भी पूर्ण पड़ती है । शनि की दृष्टि तृतीय तथा दशम भाव पर भी पूर्ण रूप से पड़ती है। राहु तथा केतु की दृष्टि पंचम तथा नवम भाव पर भी पूर्ण पड़ती है ।

ग्रहों का बलाबल

  • ग्रह जब अपनी उच्च राशि में होते हैं तो बहुत बलवान् हो जाते हैं। शुभ ग्रहों का बलवान् होना धन देता है अतः बल का परीक्षण अत्यावश्यक है।
  • ग्रह जब उच्च राशि से सप्तम भाव में आते हैं तो “नीच” तथा निर्बल हो जाते हैं ।

ग्रह परस्पर ‘मित्र’, ‘शत्रु’ या ‘सम’ भी होते हैं ।  

  • प्रत्येक ग्रह अपने मित्र ग्रह की राशि में पड़कर बली समझा जाता है।
  • शत्रु की राशि में पड़ा हुआ ग्रह निर्बल हो जाता है ।

बलवान् शुभ ग्रह धन आदि शुभ फल देता है, अशुभ ग्रह बलवान हो तो दरिद्रता आदि अशुभता को बढ़ाता है ।

ग्रहों का स्वरूप थोड़ा बहुत आपने समझा। इसी स्वरूप को राशियाँ किस प्रकार अपने स्वामित्व द्वारा व्यक्त करती हैं यह भी आपने देखा । इसी प्रकार नक्षत्र अपने स्वामियों द्वारा किस प्रकार संसार के पदार्थों को दर्शाते हैं, यह भी आपने समझा।

कुण्डली के बारह भाव

अब कुण्डली के बारह भाव क्या-क्या वस्तु, रिश्ता-धातु इत्यादि जतलाते हैं इसको देखिये –

  1. प्रथम भाव से जन्म के समय के समाचार, वर्ण (Caste) रंग, रूप, कद, जन्म स्थान, शरीर, शरीर का विशेष अंग, धन, यश, मान. आयु, सिर, निज (Self) आदि का विचार करना चाहिये।
  2. द्वितीय भाव से मुख, धन, कुटुम्ब, मृत्यु, शाहजादा, मां, बड़ा भाई, शासन आदि का विचार करना चाहिये।
  3. तृतीय भाव से, कान, कन्धे, मांस की नाली, छोटा बाई, साहस, रक्षा विभाग, निज (Self), छोटी यात्रा, बाहु आदि का विचार करना चाहिए ।
  4. चतुर्थ भाव से माता, मन, जायदाद, वाहन, भूमि, सुख-दुःख, उन्नति, फेफडे, छाती, रक्त, जनता आदि का विचार करना चाहिए।
  5. पंचम भाव से पुत्र, विद्या, मन्त्रणा-शक्ति, प्रिया,, खेल-विनोद के स्थान, स्त्री का बड़ा भाई, पेट, बड़े भाई की स्त्री, बड़ी बहिन का पति, लाटरी, भाग्य इत्यादि का विचार करना चाहिये ।
  6. षष्ठ भाव से शत्रु, ऋण, रोग, थकावट, चोट, चोरी, व्यसन, म्लेच्छ, माँ का छोटा भाई, अन्तड़ियाँ आदि का विचार करना चाहिए।
  7. सप्तम भाव से स्त्री, गुप्तेन्द्रिय, वीर्य, नपुंसकता, व्यापार, व्यसन, मार्ग आदि का विचार करना चाहिए ।
  8. अष्टम भाव से मृत्यु, अपमान, जान-जोखों के काम, विदेश, समुद्र, अण्डकोष, नाश, आयु, माता की बड़ी बहिन का पति, माता के बड़े भाई की पत्नी आदि का विचार करना चाहिए ।
  9. नवम भाव से भाग्य, देवीसहायता, पिता, धर्म, ऊँची विद्या, स्त्री का छोटा भाई, नितम्ब, छोटे भाई की स्त्री, छोटी बहिन का पति, पैतृक सम्पत्ति आदि का विचार करना चाहिए ।
  10. दशम भाव से राज्य, कर्म, शुभ अथवा अशुभ- गवर्नमेन्ट, ऊँचाई, आसमान, पदवी, यश, घुटने आदि का विचार करना चाहिये ।
  11. एकादश भाव से बड़ा भाई, पुत्रवधू, पुत्री का पति, लाभ, आय, चोट, बीमारी, टाँग आदि का विचार करना चाहिए।
  12. द्वादश भाव से पाँव, व्यय, पृथकता भोग-विलास, माँ की छोटी बहिन का पति, माँ के छोटे भाई स्त्री, रक्षा विभाग, धर्म, मन्दिर, मोक्ष इत्यादि का विचार करना चाहिए ।

व्यवसाय का चुनाव और आर्थिक स्थिति

  1. कुण्डली की वैज्ञानिक व्याख्या
  2. ग्रहों का व्यवसाय पर प्रभाव
  3. पाराशरीय धनदायक योग 
  4. लग्नो के विशेष धनादायक ग्रह
  5. धन प्राप्ति में लग्न का महत्त्व 
  6. विपरीत राजयोग से असाधारण धन
  7. नीचता भंग राजयोग
  8. अधियोग से धनप्रप्ति
  9. स्वामिदृष्ट भाव से धनप्रप्ति
  10. कारकाख्ययोग से धनप्रप्ति
  11. सुदर्शन तथा धनबाहुल्य
  12. शुक्र और धन 
  13. जातक का व्यवसाय
  14. मित्र, भाई यॉ सम्बंधी – किससे धन लाभ होगा ?
  15. धन कब मिलेगा ?
  16. व्यव्साय चुनने की पध्दति
  17. धन हानि योग

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